Speech
Narendra Modi  ·  2026-08-15 00:00

India turned crisis into its strength! A message on grit and consistency from Red Fort

प्यारे देशवासियों पिछले 10 12 साल हम लगातार 2047 के लक्ष्य को पाने के लिए दौड़ रहे हैं। एक के बाद एक सोपान सिद्ध कर रहे हैं। हमने सोचा भी नहीं था कि हमें इसमें भी कुछ मुसीबतों का झेलना पड़ेगा। पिछले 10 12 वर्ष में कितने संकटों का सामना करना पड़ा। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया। सारी व्यवस्थाएं चरमरा गई। कोरोना से बाहर निकले। युद्ध की विभीष की विभीष की खबरें आने लगी। कहीं यूक्रेन तो कहीं पश्चिम एशिया हर जगह पर तनाव का माहौल और पता नहीं भविष्यवेत्ताओं ने तो न जाने क्या-क्या घोषणाएं कर दी थी। देश को डराना, देश को भयभीत रखना, देश को चिंतित रखना इसी में कुछ लोगों को आनंद आता है। वैक्सीन नहीं मिलेगी। कोविड में लोग बचेंगे नहीं। कुछ भी नहीं होने वाला। वेस्ट एशिया का क्राइसिस आया। पेट्रोल पंप पे पेट्रोल नहीं मिलेगा। गैस नहीं मिलेगा, डीजल नहीं मिलेगा, फर्टिलाइजर नहीं मिलेगा। सारी दुनिया भर की अफवाहएं फैला करके भारत के लोगों को भयभीत करने का, डराने का, चिंता के अंदर डुबो देने का, कुछ लोगों को आनंद आ रहा था। लेकिन देश ने देख लिया कि पिछले 101 साल की सुविचारित योजनाएं रंग ला रही है और हम इतने बड़े संकट के बावजूद भी नागरिक देवो भव के मंत्र को लेकर के जीते हुए भारत ने जो तैयारियां की थी एक के बाद एक कदम उठाया था। सोचा नहीं था कि संकट आएगा। लेकिन इस संकट के समय में यह सारी चीजें काम आ गई और आज देश में गैस भी है, पेट्रोल भी है, यूरिया भी है। हम अपनी ताकत के ऊपर खड़े हो रहे, चल रहे हैं। मेरे प्यारे देशवासियों, दुनिया के इन संकटों का प्रभाव हर किसी पर हुआ। हम भी अछूते नहीं। यूरिया के दाम दुनिया में ₹000 पहुंच गए एक बोरी का। आज भी हम मेरे देश की किसानों को वह बोझ सहने के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं। सरकार अपने कंधों पर वो बोझ उठा रहा है और दुनिया से जो ₹3000 में यूरिया का बोरा हमें मिलता है वो हमारे किसानों को हम सिर्फ ₹300 में दे पाते हैं। इतना ही नहीं डीएपी आज दुनिया में बाजार 5000 पहुंच चुका है। लेकिन मेरे देश के किसानों को दिक्कत ना हो इसलिए ₹1350 में आज भी डीएपी देने का काम हम कर रहे हैं। मेरे प्यारे देशवासियों एक समय था जब मैं आत्मनिर्भरता की बात कर रहा था तो कुछ लोग एयर कंडीशन चैंपियन में बैठकर के सोचने वाले लोग हमें बता रहे थे ग्लोबलाइजेशन का क्या होगा? लेकिन दुनिया देख रही है कि पिछले एक दशक में ऐसा लग रहा है कि दुनिया ने ग्लोबलाइजेशन बोलना ही बंद कर दिया है। जहां से ग्लोबलाइजेशन की आवाजें आती थी वो बंद सुनाई नहीं देती है। दुनिया का हर देश अपनीपनी संभालों के मिजाज की तरफ गया है। लेकिन दुर्भाग्य से इस संकट के कालखंड में कुछ लोगों ने अपना रुतबा दिखाने के लिए संसाधनों को वेपनाइज करने का खेल खेला है। दुनिया अपने पास जो कुछ भी है उसको वेपनाइज करने में लगी है। संसाधनों का वेपनाइज, रिसोर्स का वेपनाइज, पेट्रोल, डीजल, फर्टिलाइजर, दवाइयां, टेक्नोलॉजी की चिप्स। इतना ही नहीं भूभाग को भी वेपनाइज किया जा रहा है। मुझे और ऐसे समय अगर हम आत्मनिर्भरते मंत्र को लेकर 10 साल सही दिशा में ना चले होते तो हम कल्पना कर सकते हैं कि ऐसी चुनौतियों का मजबूती से मुकाबला कैसे करते और हमारी तैयारियां निरंतर बढ़ती जा रही है।