PM Modi's remarks on the 125th Janma Jayanti of Dr. Syama Prasad Mookerjee | English Subtitles
केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे सहयोगी अमित भाई शाह, गजेंद्र सिंह शेखावत, पश्चिम बंगाल के ऊर्जावान मुख्यमंत्री, शुभेंदु अधिकारी, भाजपा के वरिष्ठ सदस्य, हम जैसे लाखों कार्यकर्ताओं की प्रेरणा, श्रीमान माखन लाल जी, भाजपा प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष श्री शौमिक भट्टाचार्य उपस्थित जनप्रतिनिधि गण अन्य महानुभाव देवियों और सज्जनों आप सबको मेरा नमस्कार। मैं अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के कारण इस समय प्रवास पर हूं। लेकिन टेक्नोलॉजी की मदद से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में आपसे जुड़ रहा हूं। साथियों आज देश की धरती पश्चिम बंगाल की धरती अपने एक महान सपूत एक महान देशभक्त भारत की अखंडता के लिए समर्पित एक युग दृष्टा को श्रद्धा पूर्वक स्मरण कर रही है। आज हम उस विचार बीज का गुणगान कर रहे हैं जो वर्तमान समय में चारों तरफ फल फूल रहा है। जो आधुनिक भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। साथियों जहां जमीन से जुड़ी हुई वैचारिक शक्ति हो साथ-साथ इरादे मजबूत हो और नियत साफ हो और जब नए संकल्प के साथ संपूर्ण समर्पण हो और ये सारी कड़ियां जब आपस में जुड़ जाती हैं तो संकल्प की सिद्धि होती ही होती है। और डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ऐसा ही जीवन जी करके दिखाया है। मैं डॉ. मुखर्जी की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर उन्हें नमन करता हूं। अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। साथियों आज का यह कार्यक्रम इस बात का भी साक्षी है कि जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है तो राष्ट्र नायकों को सम्मान भी मिलता है और उनके विज़न पर चलने का भी प्रयास होता है। डॉ. मुखर्जी की 125वीं जन्म जयंती को हमारी सरकार दो वर्षों के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रही है। ये पिछले वर्ष 6 जुलाई को शुरू हुए थे और अगले साल 6 जुलाई तक चलेंगे। और अब तो बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस राष्ट्रीय सम्मान को एक प्रेरणा पुरुष को याद करने में बंगाल ने अपने आप में रौनक बढ़ा दी है। कुछ दिन पहले ही 20 जून को भव्य तरीके से पश्चिम बंग दिवस का आयोजन किया गया था। यह बंगाल की धरती बंगाल की विरासत को प्रणाम था। आज का यह कार्यक्रम अपनी विरासत के प्रति उसी सम्मान का हिस्सा है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार को इतने भव्य कार्यक्रम के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। साथियों डॉक्टर मुखर्जी का जीवन एक विचार से जन आंदोलन तक की परिणति का प्रेरक है। उन्होंने भारत में एक वैचारिक आंदोलन को जन्म दिया। आप देखिए जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई थी तब हर तरफ कांग्रेस की ही बोलबाला थी। कांग्रेस का ही वर्चस्व दिखाई देता था। एक ऐसे दौर में जब अलग विचार के लिए कोई जगह ही नहीं थी। बड़ी मुश्किल सा पैर रखने के लिए भी जगह मिल जाए। तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन सारी परिस्थितियों को चुनौती देते हुए एक नए विचार का साहस किया। यह केवल एक संगठन बनाने का निर्णय नहीं था। एक राजनीतिक दल को जन्म देने का काम नहीं था। यह लोकतंत्र में वैचारिक विविधता, राष्ट्रीय चिंतन और जन भागीदारी पर उनके अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थी। इसी विश्वास से भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ और साथियों कोई भी विचार केवल स्थापना से अमर नहीं होता। विचार तब अमर होता है जब पीढ़ियां उसे अपने जीवन से सींचती है। भारतीय जनसंघ के उस छोटे से दिए को जलाए रखने के लिए लक्षावधि कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन खपा दिया। पल पल तिल तिल लाखों कार्यकर्ताओं के तप त्याग और समर्पण ने उस दिए की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज वह दिया अपने मूल स्वरूप में भले ना दिखाई देता हो भारतीय जनसंघ आज उसी रूप में भले ना हो लेकिन उस दिए का जो प्रकाश पुंज था वो आज करोड़ों देशवासियों के विश्वास का प्रकाश बनकर फैल रहा है। उसी प्रकाश का विस्तार आज पूरे देश में खिले हुए करोड़ों कमल के रूप में भी दिखाई देता है। कभी जो भारतीय जनसंघ था वही आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बनकर जनसेवा कर रहा है। साथियों अक्सर हम देखते हैं कि समय के साथ कुछ विचारों का आकर्षण फीका पड़ जाता है। लेकिन आप सोचिए यह कितना सशक्त विचार बीज डॉक्टर मुखर्जी ने रोपा है कि आज इतने साल बाद भी उसका इतनी तेजी से विस्तार हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है जब आने वाली पीढ़ियां भारतीय जनता पार्टी की इस यात्रा का इतिहास लिखेगी इसका अध्ययन करेंगी तब वे निश्चित रूप से डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों उनके साहस और उनकी दूरदृष्टि का उल्लेख करेगी। और मैं फिर कहूंगा बंगाल के लिए तो यह डबल खुशी की बात है। एक तो डॉ. मुखर्जी की 125वीं जन्म जयंती और दूसरा बंगाल में यह आयोजन। उनके विचार पुंज से निकली भाजपा सरकार में यह भव्य उत्सव हो रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता की तरफ से अपने महान सपूत को यह बहुत ही आत्मीय श्रद्धांजलि है। साथियों संसद में अपने एक भाषण में डॉक्टर मुखर्जी ने कहा था और यह डॉक्टर मुखर्जी का यह वाक्य आज भी हमें प्रेरणा देता है। डॉ. मुखर्जी ने पार्लियामेंट में कहा था राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। और देखिए आज देश गर्व से कह सकता है कि डॉक्टर मुखर्जी अंतिम सांस तक इसी विश्वास को वो जीते थे। उन्होंने इसे जिया था। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ लगभग तय हो चुका था। तब एक और संकट सामने था। पूरे के पूरे बंगाल को ही भारत से अलग करने की साजिशें रची रही थी। तब डॉक्टर मुखर्जी इन साजिशों के सामने चट्टान बनकर खड़े हो गए। उन्होंने जनमत तैयार किया। राजनीतिक संघर्ष किया और यह सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे और तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हुंकार भरी थी। उनके शब्द थे कांग्रेस देश भाग कोरे से आ पाकिस्तान के भाग कोरे यानी कांग्रेस ने देश का बंटवारा किया और मैंने पाकिस्तान का ही बंटवारा कर दिया। साथियों, यह जो हुंकार है, इसकी जो ताकत है, इसमें जिस बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति के दर्शन होते हैं, उसका एहसास हमें तब भी होता है जब हम आज की परिस्थितियों को देखते हैं। साथियों डॉ. मुखर्जी एक भारत श्रेष्ठ भारत के लिए पूरी तरह से समर्पित थे और इसलिए जब देश में दो विधान दो प्रधान दो निशान की बात हुई तो डॉक्टर मुखर्जी ने इसका भी जमकर विरोध किया। उन्होंने देश को मंत्र दिया। एक देश दुविधान द्व प्रधान एवं दुई निशान आमरा को खोनो मैंने नेबोना यानी एक देश में दो विधान दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे यह केवल एक नारा नहीं था। यह समान अधिकार, समान संविधान और समान राष्ट्रीय चेतना का आह्वान था। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया। जेल गए और अंततः कश्मीर के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आज हमारी सरकार को इस बात का गर्व है कि आर्टिकल 370 की दीवार गिराकर हमने डॉक्टर मुखर्जी का सपना पूरा किया है। साथियों आज जब हम एक भारत श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं तो यह उसी राष्ट्रीय दृष्टि का विस्तार है जिसे डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन से परिभाषित किया। एक ऐसा भारत जहां उत्तर और दक्षिण के बीच कोई दूरी ना हो। जहां पूर्व और पश्चिम समान अवसरों के सहभागी हो। जहां हर राज्य अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भारत की सामूहिक शक्ति बने। जहां हर नागरिक, एक ही संविधान, एक ही राष्ट्रीय भावना और एक ही भविष्य के संकल्प से जुड़ा हो। मुझे खुशी है कि डॉक्टर मुखर्जी की प्रेरणा से आज भारत का संविधान पूरे देश में आन बान शान के साथ लागू है। और कोटि-कोटि देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है। साथियों डॉ. मुखर्जी इस बात को अच्छे से समझते थे कि संस्थाओं के निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का तत्व छुपा है। मात्र 33 वर्ष की आयु में डॉ. मुखर्जी कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। लेकिन उन्होंने उस पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने विश्वविद्यालय को भारत के भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा को गुलामी की सोच के दायरे से बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने कहा बंग जाति आत्म सम्मान पुनरद्धार एवं मात भाषा मध्य में शिखार प्रसार ए आदे प्रधान लोगो होवा उचित यानी बंगाल के लोगों का आत्मसम्मान लौटाना और मातृभाषा में पढ़ाई यह हमारा प्रथम उद्देश्य है। उनका विश्वास था कि यदि भारत को आत्मविश्वास से राष्ट्र बनाना है तो उसकी शिक्षा भी भारतीय आत्मा से जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया। आज हमें इस बात का भी गर्व है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया जा रहा है। जो सपना डॉक्टर मुखर्जी ने देखा था। वह हमारी सरकार ने पूरा किया है। साथियों, स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास का बहद विजन रखा था। उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक शक्ति बने। चित्रंजन लोकोमोटिव वक्स ने भारत की रेल व्यवस्था को नई गति दी। सनरी फर्टिलाइजर प्लांट ने कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाया। दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने ऊर्जा और सिंचाई का नया अध्याय लिखा। इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया आईएफसीआई उसने भारतीय उद्योगों को वित्तीय आधार दिया। साथियों उनके लिए उद्योग फैक्ट्रियां ये केवल कुछ कल कारखाने नहीं थे। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं थे। रिसर्च इंस्टिटशंस केवल वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं थे। उनके लिए यह सभी राष्ट्र निर्माण के साधना केंद्र थे। डॉ. मुखर्जी ऐसी संस्थाओं के पक्षधर थे जो टैलेंट को अवसर दें। ऐसी शिक्षा जो इनोवेशन को प्रोत्साहन दे। ऐसे उद्योग जो आत्मनिर्भरता का आधार बने और ऐसी व्यवस्था जो आने वाली पीढ़ियों को और अधिक सशक्त भारत सौंप सके। और यही स्पिरिट आज विकसित भारत की भी प्रेरणा है। साथियों आज के इस अवसर पर मैं बंगाल के पूरे देश के मेरे युवा साथियों से कहूंगा डॉ. मुखर्जी ने एक भारत के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हम सबको श्रेष्ठ भारत के लिए जीना है। हमें मिलकर विकसित भारत का संकल्प सिद्ध करना है। हमें देश को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी आह्वान के साथ एक बार फिर से मैं डॉ. मुखर्जी को नमन करता हूं। मैं उनके ही शब्दों में अपनी बात समाप्त करूंगा। यह डॉक्टर मुखर्जी के शब्द हैं। यह उनके भाव भंगिमा है। जे काज ए हाथ नावो ना केनो ता अत्यंतो गुरुत्वारे कोते होवे जो भी काम आरंभ करो उसे पूरी गंभीरता से करो। तन्मयता से करो। पूरी निष्ठा से करो। कोई भी काम अधूरा ना छोड़ो। उसे जरूर पूरा करो। डॉक्टर मुखर्जी के शब्दों में प्रवाहितय भावना के साथ इनके ही इन शब्दों के साथ आप सभी को भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद।