Viveka Smaraka will inspire India's future nation builders - PM establishes!
साथियों व्यक्ति से विभूति का निर्माण एकाएक नहीं होता। इसके लिए हमें जीवन की अनगिनित परीक्षाएं देनी होती है। साधना करनी होती है। तप करना होता है। खुद को तपाना पड़ता है। खपाना पड़ता है। ख्याति के बाद तो संसार पीछे खड़ा होता है। लेकिन तप के समय महान विभूतियों को पहचानना आसान नहीं होता। जो साधक को तपस्या में पहचानता है, वह उसकी सिद्धि का सहभागी सहभागी भी होता है। इसलिए भाइयों बहनों स्वामी विवेकानंद जी के जीवन में मैसूरों का इतना अहम योगदान था। करीब 130 वर्ष पहले स्वामी जी एक युवा सन्यासी के रूप में भ्रमण करते हुए मैसूर आए थे। तब उनकी प्रसिद्धि वैसी नहीं थी। लेकिन विचार उतने ही ऊंचे थे। उस समय उन्हें जिन लोगों ने पहचाना जो उनके साथ जुड़े उनमें से एक प्रमुख नाम मैसूरों के तत्कालीन महाराजा के भी था। जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे तो उन्होंने वहां से मैसूर के तत्कालीन महाराजा को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने स्वयं महाराजा के सहयोग का उल्लेख किया था। साथियों स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय चेतना को आत्मसात किया था। उन्होंने शास्त्रों को आत्मसात किया था। जो कहते हैं परम परोपकारार्थ यो जीवती सजीवती अर्थात वास्तव में वही जीता है जो दूसरों के लिए जीता है। [हौसला बढ़ाने की आवाज़] इसी मंत्र पर चलते हुए मैसूर के इस श्री रामकृष्ण आश्रम ने पिछले वर्ष अपने 100 साल पूरे किए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं हो यह प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य श्री रामकृष्ण आश्रम ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत को जीवंत रखा है। मुझे विश्वास है विवेक का स्मारका साधकों और श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक उत्थान का एक तीर्थ बनेगा। स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा थी। शिव ज्ञान जीव सेवा यानी जीव की सेवा ही शिव की सेवा है। हमें इस विवेक का स्मारक में इसलिए ऐसे युवाओं को गढ़ना है जिनके लिए समाज और राष्ट्र के हित गरीब वंचित के दुख अपने सुख-दख से ऊपर हो। जिन युवाओं के लिए राष्ट्र प्रथम ही सर्वोपरि मंत्र हो। मां भारती की सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य हो।