Strong institutions are the foundation of nation building: Dr. Syama Prasad Mookerjee’s vision!
साथियों डॉक्टर मुखर्जी इस बात को अच्छे से समझते थे कि संस्थाओं के निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का तत्व छुपा है। मात्र 33 वर्ष की आयु में डॉ. मुखर्जी कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। लेकिन उन्होंने उस पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने विश्वविद्यालय को भारत के भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा को गुलामी की सोच के दायरे से बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने कहा बंगो जाति आत्म सम्मान पुनरद्धार एवं मात भाषा मध्य में शिखार प्रसार ए आदे प्रधान लोखो होवा उचित यानी बंगाल के लोगों का आत्मसम्मान लौटाना और मातृभाषा में पढ़ाई यह हमारा प्रथम उद्देश्य है। उनका विश्वास था कि यदि भारत को आत्मविश्वास से राष्ट्र बनाना है तो उसकी शिक्षा भी भारतीय आत्मा से जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया। आज हमें इस बात का भी गर्व है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया जा रहा है। जो सपना डॉक्टर मुखर्जी ने देखा था। वह हमारी सरकार ने पूरा किया है। साथियों, स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास का बहद विजन रखा था। उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक शक्ति बने। चित्रंजन लोकोमोटिव वक्स ने भारत की रेल व्यवस्था को नई गति दी। सेंद्री फर्टिलाइजर प्लांट ने कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाया। दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने ऊर्जा और सिंचाई का नया अध्याय लिखा। इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया आईएफसीआई उसने भारतीय उद्योगों को वित्तीय आधार दिया। साथियों उनके लिए उद्योग फैक्ट्रियां ये केवल कुछ कल कारखाने नहीं थे। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं थे। रिसर्च इंस्टिटशंस केवल वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं थे। उनके लिए यह सभी राष्ट्र निर्माण के साधना केंद्र थे। डॉ. मुखर्जी ऐसी संस्थाओं के पक्षधर थे जो टैलेंट को अवसर दें। ऐसी शिक्षा जो इनोवेशन को प्रोत्साहन दें। ऐसे उद्योग जो आत्मनिर्भरता का आधार बने और ऐसी व्यवस्था जो आने वाली पीढ़ियों को और अधिक सशक्त भारत सौंप सके और यही स्पिरिट आज विकसित भारत की भी प्रेरणा है।